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शिक्षा का एकमेव पथ एकाग्रता

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  मनुष्यों के जीवन मे ज्ञान की प्राप्ति के लिए केवल एक ही मार्ग है और वह है 'एकाग्रता'। 'मन की एकाग्रता' ही शिक्षा का सम्पूर्ण सार है । ज्ञानार्जन के लिए निम्नतम श्रेणी के मनुष्य से लेकर उच्चतम योगी तक को इसी एक मार्ग का अवलम्वन करना पड़ता है। रासायनिक अपनी प्रयोगशाला मे अपने मन की सारी शक्तियों को एकाग्र करके एक ही केन्द्र में स्थिर करता है और तत्त्वों ( elements ) पर प्रक्षेप करता है - उससे तत्त्व विश्लेषित हो जाते हैं और उसे की प्राप्ति हो जाती है। ज्योनिपी अपने मन की शक्तियों को एकाग्र करके एक ही केन्द्र पर लाता है और दूरदर्शी यन्त्र के द्वारा उन्हें अपने विषयो पर लगाता है; वस त्योंही तारागण और ग्रहसमुदाय सामने चले आते है और अपना रहस्य उसके पास खोलकर रख देते है। चाहे विद्वान् अध्यापक हो, चाहे मेघावी छात्र हो, चाहे अन्य कोई भी हो, यदि वह किसी विषय को जानने की चेष्टा कर रहा है, तो उसे उपर्युक्त प्रथा से लेना पड़ेगा । काम एकाग्रता की शक्ति जितनी अधिक होगी, ज्ञान की प्राप्ति उसको भी उतनी ही अधिक होगी। नीच चर्मकार भी यदि अधिक एकाग्रचित्त होगा, तो जूता अधिक अच्छा साफ करेग...

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भारत बनेगा विश्व गुरु..

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युगो युगो से जब भी विश्व में संकट आया है,तब भारत ने विश्व का नेतृत्व किया है। जब नेतृत्व किया तब भारत का उत्थान हुआ है। पुनः एक बार भारत पूरे विश्व में करोना जैसी भयावह बीमारी जो संकट लेकर आई है और पूरा विश्व इस से लड़ रहा है,तब भारत ने फिर एक बार पूरे विश्व को इस महामारी से बाहर निकालने के लिए HQC (हाइड्रोक्सी क्लोरो क्वीन) तथा कोविड-19 वैक्सीन संपूर्ण विश्व को दिया है हर व्यक्ति के मन में यह धारणा बन गई है, कि 2020 खत्म हो गया 2021 खत्म होने वाला है लेकिन यह संकट कब खत्म होंगे। परंतु प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव की बात है कि सन 2020 में ही दो महत्वपूर्ण कार्य हुए जो लंबे समय से अटके पड़े थे।भारत को पुनः एक बार विश्व गुरु पद पर स्थापित करेगा। 29 जुलाई 2020 को भारत सरकार की केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति ले के आई है जो संपूर्ण समाज को एक नई दिशा दशा बदलने में मददगार साबित होगी भारत के युवा के व्यक्तित्व विकास कौशल विकास के लिए सभी प्रकार के विषय सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में रखी है दूसरा सबसे महत्वपूर्ण 5 अगस्त सन 2020 को भगवान श्री राम के निजी धाम अयोध्या जी में श्री...

मनुष्य, जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है.

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मनुष्य जीवन मे यह एक बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जो मनुष्य दिन रात सोचता रहता है कि मैं कुछ भी नही हूँ, उससे हम कोई आशा नही रख सकते ।यदि कोई दिन रात यही सोचता रहे कि मैं दीन-हीन हूँ, नाचीज हूँ, तो वह सचमुच नाचीज वन जायगा। अगर हम सोचे कि मै कुछ हूँ, हमें शक्ति है, तो सचमुच हमे शक्ति आ जायगी।  एक मेरे सच्चे मित्र है उनसे मेरी बात हो रही थी, व्रत,श्रद्धा और पूजा पे तो उनका कहना था कि  अगर आप दिन में 10 बार कहे कि माँ शक्ति दो , तो देखिएगा आपको अलग प्रकार के शक्ति की अनुभूति होगी, शक्ति यानी विश्वास,श्रद्धा और आत्मबल। यह एक महान् सत्य है, जिसका हमे स्मरण रहना चाहिए । हम उस सर्वशक्तिमान प्रभु की सन्तान है— उस अनन्त ब्रह्माग्नि की चिनगारियाँ है ! हम नाचीज कैसे हो सकते है ? हम सब कुछ है, सब कुछ करने को तैयार हैं और सब कुछ कर सकते हैं। हमारे पूर्वजों में ऐसा ही दृढ आत्मविश्वास था। इसी आत्मविश्वासरूपी प्रेरणा शक्ति ने उन्हें सभ्यता की ऊँची-से-ऊँची सीढ़ी पर चढ़ाया था। और अब यदि अवनति हुई है, यदि कोई दोष आ गया है, तो तुम देखोगे, इस अवनति का आरम्भ उसी दिन से हो गया, जब से हम अपने इस आ...