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ज्ञान से आनंद की यात्रा तक (डॉ नीतेश सिंह)

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ज्ञान से आंनद की यात्रा तक.. जो जितेन्द्रिय तथा साधन परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है, और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है। योग्यता के बिना किसी भी लक्ष्य की प्रप्ति नहीं होती। ज्ञान के तीनो गुणों को समझने से यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि अनेक वर्षों तक साधना करने पर भी कुछ साधक लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुँच पाते हैं। श्रद्धा,भक्ती तथा इंद्रिय संयम ये वे तीन अत्यावश्यक गुण हैं जिनके द्वारा जीवत्व के बन्धनों से मुक्त होकर हम देवत्व को प्राप्त करने की आशा कर सकते हैं।  परन्तु इन तीनों शब्दों के अर्थों के विषय में अनेक विपरीत धारणायें फैल गयी हैं। ●श्रद्धा अनेक पाखण्डी गुरु लोगों की धार्मिक भावनाओं का अनुचित लाभ उठाते हुये श्रद्धा शब्द की आड़ में विपुल धन अर्जित करते हैं।  श्रद्धा शब्द का अर्थ अन्धविश्वास करके सामान्य भक्त जनों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास की सर्वथा उपेक्षा कर दी जाती है।  श्रद्धा का अर्थ यह नहीं है कि दैवी माने जाने वाली किसी घोषणा को बिना सोचे समझे वैसे ही स्वीकार कर लिया जाय। श्री शंकराचार्य के अनुसार श्रद...

समय पालन से व्यक्तित्व विकास की यात्रा (डॉ नीतेश सिंह)

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भारत संतो की भूमि है और सभी संतो ने समय पालन से समाज को एक नई दिशा दिया है। छड़ प्रति छड़ समय का महत्व करना सिखाया है। समान्य मनुष्य को भगवान बनाया है  शंकराचार्य मानते हैं कि संसार में ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव और ब्रह्म अलग नहीं हैं। जीव केवल अज्ञान के कारण ही ब्रह्म को नहीं जान पाता जबकि ब्रह्म तो उसके ही अंदर विराजमान है। उन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र में "अहं ब्रह्मास्मि" ऐसा कहकर अद्वैत सिद्धांत बताया है। शंकराचार्य ने समय का पूरा उपयोग किये और समान्य बालक से भगवान बने। जब भी आपको लगे की सामने वाला हमसे अच्छा कार्य कर रहा है तो समझना की उसका समय बाध्यता हमसे अच्छा है। 1दिन में 24घंटे ही होते है और उसमे भी बहुत सारे काम और सभी काम को समय से और सुन्दर करना है। यह करना होगा की हम सबसे पहले कौन से काम को करें।जीवन को सुन्दर बनाने के लिए समय का सदुपयोग करना जरूरी। प्रातः से लेकर रात्रि तक अपने समय को बाध्य करना होगा तभी हम कुछ अलग कर सकते है।  प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥ बालक राम के जीवन की बात करें तो सुबह उठते ही माता-पिता और गुरु के चरणों म...

हिन्दी सिनेमा का व्यवसायिकरण(डा नीतेश सिंह)

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हिन्दी सिनेमा का व्यवसायिकरण(डा नीतेश सिंह) भारतीय समाज में हिन्दी सिनेमा मनोरंजन का एक साधन ही नहीं बल्कि संचार का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। भूमण्डलीकरण के पश्चात संचार के क्षेत्र में आई क्रान्ति के प्रभाव से सिनेमा भी अछूता नहीं रहा। हिन्दी सिनेमा के इतिहास पर नजर डाले तो हम पाते हैं कि मूक फिल्में परदे पर दिखाई जाती थी इसके बाद ‘आलमआरा’ से बोलने वाली फिल्मों का प्रचलन शुरू हुआ, ब्लैक एण्ड वाईट फिल्मों की जगह आज के समय में रंगीन फिल्में परदे पर दिखाई जाती थी। अब एक नए प्लेटफार्म के रूप में ओटीटी (ओवर-द-टॉप) आया है जिसने व्यावसायिकता का एक नया किर्तीमान हांसिल किया है।  दृश्य व श्रृव्य का यह मिलाजुला स्वरूप आज सभी के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। खास कर युवाओं में इसके प्रति अधिक आकर्षण देखने को मिल रहा है। एक शोध 2022 के मुताबिक भारत में लगभग 36 करोड से अधिक लोग इनके उपयोगकर्त्ता हैं जिनमें सबसे अधिक 22 से 30 वर्ष के युवा हैं। एक वर्ग के लोग अपनी रूचि के अनुरूप अपनी मन पसंद फिल्में बडे़ चाव से देखते है। युवावर्ग हो चाहें बच्चें फिल्मों के प्रति उनका आकर्षण देखेते बनता है।  फि...