भारतभूमि हेतु हमारी भूमिका
भारतभूमि हेतु हमारी भूमिका
भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर बात करने से भारत वर्ष को जान लेना अनिवार्य है क्योंकि भारत आज से नहीं बल्कि सदियों पहले से अपना वर्चस्व दुनिया में स्थापित कर चुका है अब बात पुनरुत्थान की है समय के साथ सम्भवतः कई उतार-चढ़ाव आते रहते हैं सत्ता हमेशा एक जैसी नहीं रहती आज भी विश्व को भारतीय दर्शन और दृष्टिकोण की आवश्यकता है दुनिया के इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर न तो धर्मात्मा हुआ न ज्ञानयोगी व्यक्तित्व ने आगमन किया मानवता की रक्षा-सुरक्षा के लिए भारत ने अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया है हम लोग भारत के वासी होकर भी भारत के बारे में तुच्छ जानकारी रखते हैं ज्ञान तो कोसों दूर है हमारी पहुँच से, ऐसा इसलिए भी है हम जानने के लिए केवल सीमित दायरे में रहकर ही विचार करके स्वयं को प्रतिभावान समझने का भ्रम पाल बैठे हैं भारत की विशाल सभ्यता और संस्कृति हमें आजीवन सीखने के स्त्रोतों को उपलब्ध करवाने के काफी है या यूँ कहें की 100 वर्ष आयु में भी हम भारत का कुछ प्रतिशत हिस्सा ही जान पाएँगे और पूरी तरह से जानने के लिए इतना समय कम है और काल्पनिक दुनियां में उत्तरी-पूर्वी तथा दक्षिणी-पश्चिमी के चुनिदा स्थानों का प्रवास कर हम भारत भ्रमण की मोहर लगा चूहे खाने वाले सांप की तरह निश्चिंतता से बैठ जाते हैं बात आन्तरिक मन से विशलेषण कर तैयारी की जब मन में त्याग और समर्पण की भावना की आ जाए कुछ समय के लिए जब हम भूल जाएँ कि संसार और परिवार हमारे बिना भी चल सकता है और बहुत अच्छे से चल सकता एक व्यक्ति की हमारे लिए सिर्फ उतनी ही आवश्यकता है जितना उसका जीवन उसके बाद थोड़ा उपर-नीचे की स्थिति-परिस्थिति में परिवार चल सकता है संसार तुम्हारी परिधि से बाहर की सत्ता है कुंडली मारकर घर की तमाम जिम्मेदारी का आजीवन ठेका लेना आपके जागरूक मानव के रूप को संदेह के घेरे में खड़ा कर सकता है हम परिवार व्यवस्था अथवा नौकरीपेशा इत्यादि के खिलाफ जाकर कार्य करने की बात नहीं बल्कि हमारी जो दिनचर्या है उसमे हमने स्वयं के लिए स्थान नहीं रखा केवल तीव्र गति से एक अंतहीन होड़ में स्वयं को झोंक दिया है चौबीस घंटे में से एक घंटा तीस दिन में एक दिन अथवा तीन सौ पैंसठ दिनों में तीस दिन यदि हम केवल अपने व्यक्तित्व के विकास के समयदान करें तो कुछ अवधि में आपकी संकुचित मानसिकता विस्तृत क्षेत्र को छु सकेगी यहाँ आपकी निश्चित रूप से प्रगति होगी
जब हम किसी विशेष दिशा की ओर अग्रसर होने लगते हैं तभी हमें संसारिक प्रक्रिया का बोध होने लगता और जब हमारे भीतर प्रबुद्धता घर करने लगती है अज्ञानता झड़ने लगती है यह आध्यात्मिक का विषय नहीं । स्वयं से मिलने की औपचारिकता है इससे पहले हम अपने को अनदेखा कर रहे थे अब जब स्वयं से संवाद स्थापित कर लिया है तो वह करना चाहिए जो बेहद सार्थक है सामाजिक जीवन में को अधिक सरल बनाने के लिए स्वतंत्रता की अवधारणा को गहरे से समझना होगा जैसे कि हम सभी जानते हैं कोई भी कार्य या व्यक्ति हमारे अनुसार ही व्यवहार करे तो हमें अच्छा लगता है और वह भी यही सोचता है इसलिए अपने को समझने से तात्पर्य यही है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पहल देनी होगी स्वतन्त्रता का अर्थ यह कतई नहीं कि हम समाज और परिवार को दरकिनार कर दें बल्कि उसमें स्वयं को प्राथमिकता दें
अक्सर होता क्या है कि हम जिन बन्धनों में बंधे है उनको स्वयं निर्मित जेल कह सकते हैं और जिसमें हमारा दोष नहीं होता पर सजा ताउम्र भुगतनी पड़ती है मगर इसको लचीला बनाया जा सकता है इसके लिए किसी वैर-विरोध करने की जरूरत नहीं बल्कि अपने अंदर स्थिरता लाकर ।
भारत में पैदा होने वाला प्रत्येक व्यक्ति सौभाग्यशाली है क्योंकि उसके लिए अपार संभावनाएं हैं जीवन को सार्थक बनाने की इसलिए किसी परिस्थिति में खुद को सफल मानने का भ्रम पैदा करने से पहले यह भी जान ले कि जहाँ अपने स्वयं को रोक दिया है वहीं आपके विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है या फिर अनेक मार्गों पर आप निकल सकते हैं प्रकृति दर्शकों की भांति देखने की नायाब चीज नहीं है यह आपके अस्तित्व का विराट क्षेत्र विशेष है ठीक वैसे ही समाज और देश है आपका परिवार आपके लिए विशेष पहचान हो सकता सामाजिक तथा आर्थिक सुरक्षा का माध्यम भी किन्तु केंद्र नहीं जब आप इस परिधि से बाहर निकलते हैं तब आप भारतीय सभ्यता और संस्कृति को गहरे से महसूस कर सकेंगे और कहीं अधिक सुरक्षित
जाने अनजाने कई बार हम अंतरिम राहत महसूस करते हैं केवल कुछ समय के लिए तब हम सिर्फ़ अपने आप में होते हैं और जब हम भारत को इस दृष्टिकोण से देखेंगे तो हमारा विचार और अधिक प्रबल हो सकता है और तब हम अपने जीवन का असल मकसद जान सकते हैं। भाषा को पढ़ने वाले व्यक्ति के लिए विषय हो सकता है मगर शिक्षा के क्षेत्र में विशेष स्थान रखने वाले शिक्षकों के लिए यह थोड़ा अलग है। शिक्षण कार्य बेहद खूबसूरत किन्तु चुनौती पूर्ण कार्य है विद्यार्थी जीवन में हम केवल अपनी सुविधा के बारे में ही सोचते हैं जीवन में एक दिशा की और योजनाबद्ध तरीके से जा सकते हैं शिक्षक ऐसा नहीं कर सकता उसके लिए कुछ निर्धारित पैमाने हैं आप कहेंगे ये विद्यार्थी जीवन में भी थे अब भी है
बहुत अंतर है शिक्षक का पेशा पूरी ईमानदारी से किसी के जीवन को दिशा देने वाला है ऐसे में कई बार मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है ऐसा ही कई बार घर परिवार में भी हो जाता है इसको सन्तुलित करने का उपाय है खुद को कुछ समय के लिए ऐसे कार्य में लगा दो जो निस्वार्थ भाव से हो या फिर घूमने जा सकते हो या ऐसा काम करना जिसको आप इच्छा अनुसार कर सकें व्यक्तित्व का विकास सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है।
भारत माता की जय🚩
वन्देमातरम 🙏
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बहुत खूब भाई साहब 💐
जवाब देंहटाएंअति सुंदर! 👌
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