भक्त के लिए भगवान बैकुंठ भी छोड़ते

भक्तों के लिए भगवान बैकुंठ से भी आते हैं वह उस भक्त के श्रद्धा,धैर्य,निरंतरता,निडरता,उत्सुकता पर निर्भर करता है, आइये जानते है भक्त और भगवान के मधुर संबंध को :-

भक्ति मार्ग में यह सिद्धांत सर्वविदित है कि भगवान अपने अनन्त आवास दिव्य लोक बैकुंठ में निवास करते हुए भी अपने सच्चे भक्तों के आह्वान पर तत्काल उपस्थित होते हैं।

                            दिव्य लोक बैकुंठ धाम   

यह केवल भावुक कल्पना नहीं, बल्कि पुराणों में वर्णित लीला और तत्त्व-ज्ञान से सिद्ध सत्य है।जहाँ भगवान को केवल सर्वशक्तिमान नहीं, बल्कि भक्तवत्सल भी कहा गया है। भक्त और भगवान का संबंध केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा का ऐसा मिलन है जहाँ भक्ति की पुकार ब्रह्मांड के सभी नियमों से ऊपर होती है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में अनेक उदाहरण हैं जो इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं। भागवत पुराण में भक्त प्रह्लाद की कथा इसका अत्यंत मार्मिक उदाहरण है। 

हिरण्यकशिपु जैसे अत्याचारी असुर-राजा के घर जन्म लेने के बाद भी प्रह्लाद की भक्ति बचपन से ही विष्णु के चरणों में अटूट श्रद्धा रही,हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रह्लाद अनेको कष्ट दिए। महर्षि नारद मुनि द्वारा दिए गए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप भक्त प्रह्लाद करते रहे। जबकि भक्त प्रह्लाद के पिता स्वयं को ही ईश्वर मानने का अहंकार रखते थे। जब हिरण्यकशिपु ने खंभे की ओर संकेत कर भक्त प्रह्लाद से पूछा कि “क्या तेरा भगवान यहाँ भी है?”, तब खंभे को चीरकर भगवान नृसिंह रूप में प्रकट हुए और भक्त की रक्षा के लिए अवतार लेकर स्वयं धर्म की मर्यादा स्थापित की।

इस घटना से यह तत्त्व स्पष्ट होता है कि भले ही बैकुंठ अचल और नित्य धाम हो, परंतु भक्त की रक्षा के लिए भगवान रूप, समय और स्थान की सीमाओं से परे होकर अवतरित होते हैं। इसी प्रकार ध्रुव की कथा बाल-भक्त के दृढ़ निश्चय और निष्कपट समर्पण की अनोखी मिसाल है। 

विष्णु पुराण और भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध के आठवें से बारहवें अध्यायों में वर्णित है कि पिता द्वारा उपेक्षित होकर पाँच वर्ष का बालक ध्रुव वन में तपस्या के लिए चला गया और श्रीहरि विष्णु का स्मरण करते हुए कठोर तप में लीन हो गया। 
नारद मुनि द्वारा दिए गए “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करते हुए उसने अनेक मास तक अन्न-जल त्याग कर उपासना की, जिससे समस्त लोक विचलित हो उठे और अंततः भगवान विष्णु स्वयं उसके सामने प्रकट हुए। ध्रुव को न केवल दर्शन मिला, बल्कि उसे ध्रुव-पद अर्थात ध्रुव तारे के रूप में अक्षय लोक की प्राप्ति का वरदान मिला, जो महाप्रलय से भी अछूता रहता है।
इन उदाहरणों से हमें यही शिक्षा मिलती है कि भगवान का अवतरण केवल अधर्म-नाश के लिए नहीं, बल्कि अपने भक्तों के प्रेम का उत्तर देने के लिए भी होता है। भागवत मत में यह स्थापित है कि भगवान और उनके नित्य पार्षद बैकुंठ से जब संसार में आते हैं, तो वह पतन नहीं, बल्कि लीला की पूर्णाहुति के लिए करुणामय अवतरण होता है। भगवान के लिए बैकुंठ या कैलाश जैसे लोक कोई बाधा नहीं हैं। जिनके हृदय में सच्ची भक्ति है, उनके लिए ईश्वर समय, स्थान और स्वरूप की सीमाओं को पार कर प्रकट होते हैं। नारद-भक्ति सूत्रों और वैष्णवाचार्यों की व्याख्याओं में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि भगवान भक्त की रक्षा, मार्गदर्शन और अंततः उसे अपने धाम में ले जाने के लिए स्वयं ही पहल करते हैं। 
अतः प्रह्लाद, ध्रुव, मीरा, तुलसीदास,चैतन्य महाप्रभु, संत एकनाथ जैसे अनेक भक्तों के जीवन में भी झलकता है। जब हृदय में शुद्ध भक्ति, समर्पण और श्रद्धा का दीपक प्रज्ज्वलित होता है, तब भगवान के लिए बैकुंठ और पृथ्वी का भेद मिट जाता है। भगवान के लिए भक्त का प्रेम ही सबसे बड़ा आकर्षण होता है—वह न तो यज्ञों से बंधा है, न विधानों से, केवल शुद्ध भाव से।भक्त और भगवान का यह संबंध दया, करुणा और प्रेम का जीवंत उदाहरण है। जब भक्त अपने समर्पण में पूर्ण होता है, तब भगवान भी अपने वैकुंठ-सिंहासन को छोड़कर उसकी पुकार सुनने आते हैं। यही भक्ति का चरम रहस्य है—जहाँ भगवान और जीव का भेद मिट जाता है और भक्ति एक सेतु बनती है, जो मनुष्य को दिव्यता से जोड़ देती है। उस क्षण भक्त का हृदय ही उनका वास्तविक बैकुंठ बन जाता है, और वहीँ भगवान अपनी लीला रचते हैं—कभी नृसिंह बनकर, कभी श्यामसुंदर बनकर, और कभी अंतःकरण में प्रकट होने वाली शांति व आनंद के रूप में।

श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास 
(भक्त अपने भगवान को जब बुलाता है तब आते केवल त्यौहार पर ही नहीं आते इसी लिए हमें भी प्रह्लाद, ध्रुव, मीरा, तुलसीदास,चैतन्य महाप्रभु, संत एकनाथ जी जैसे बनने की जरूरत है)

                        

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