लोहड़ी:-भारतीय संस्कृति का अलाव जलाने वाला आनंदमय उत्तर भारत का लोकपर्व
रत्नाकराधौतपदां हिमालय किरीटिनीम् ।
ब्रह्मराजर्षिरत्नाढ़यां वन्दे भारतमातरम् ।।
बहुमूल्य रत्नों से भरा समुद्र जिसके चरण धोता है, जिसके मस्तक पर हिमालय का मुकुट शोभायमान है जो असंख्य ब्रह्मऋषि व राजऋषियों रूपी रत्नों से समृद्धशालीनी है ऐसी भारत माता की मैं वंदना करता हूँ। अखंड भारत मे गाँवो की संख्या सबसे अधिक है और अनेक पूर्व भी है जिसके पीछे अनेको महत्व है।
अनेक पर्व मे से लोहड़ी भी उत्तर भारत का एक प्रमुख लोकप्रिय पर्व है, जो मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली जैसे क्षेत्रों में धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार 13 जनवरी को मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर आयोजित होता है और सर्दी के अंत तथा बसंत की शुरुआत का प्रतीक है।
लोहड़ी का ऐतिहासिक महत्व लोहड़ी का संबंध प्राचीन कृषि परंपराओं से है, जहां रबी की फसलों जैसे गेहूं, सरसों और गन्ने की कटाई के बाद किसान सूर्य देव और अग्नि देव का आभार व्यक्त करते हैं। यह पर्व दुल्ला भट्टी नामक एक वीर योद्धा की लोककथा से भी जुड़ा है, जो मुगल काल में गरीब लड़कियों की रक्षा करता था और उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करता था। इसके अलावा, पौराणिक कथाओं में माता सती के योगाग्नि दहन से भी इसका संबंध जोड़ा जाता है, जो अग्नि पूजा की परंपरा को दर्शाता है।
लोहड़ी सिख, हिंदू और अन्य समुदायों के लिए सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुकी है।लोहड़ी की कथा और लोक कथाएं लोहड़ी की प्रसिद्ध कथा दुल्ला भट्टी से जुड़ी है, जिन्हें पंजाब का रॉबिन हुड कहा जाता है। वे सतलुज नदी के किनारे रहते थे और मुगल अमीरों से लूटकर गरीबों को बांटते थे, विशेषकर नवविवाहित लड़कियों को।लोकगीतों में "सुंदर मुंदरियां हो गईं सज के, चलीं ढोल बजा के दुल्ले दी बरात" जैसे भांगड़ा गीत इसी कथा पर आधारित हैं। एक अन्य कथा भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से संबंधित है, जहां अग्नि पूजा उसी की स्मृति में की जाती है। ये कथाएं लोहड़ी को केवल फसल उत्सव से ऊपर उठाकर सामाजिक न्याय और प्रेम का संदेश देती हैं।
रात्रि में भांगड़ा, गिद्धा नृत्य, ढोल-नगाड़ों की थाप पर समुदाय एकत्र होता है। नवविवाहित जोड़े और नवजात शिशु वाले परिवार विशेष रूप से सम्मानित होते हैं।पारंपरिक व्यंजन और रीति-रिवाजलोहड़ी पर मकर संक्रांति से प्रेरित व्यंजन प्रमुख हैं, जैसे तिल की रेवड़ी, गजक, भुनी मूंगफली, सरसों का साग और मक्की की रोटी। ये न केवल स्वादिष्ट होते हैं, बल्कि सर्दी से बचाव के लिए पौष्टिक भी।महिलाएं चूरा (भुना चना) और लावा (भुना गेहूं) भी बनाती हैं। रीति में अग्नि भेंट के बाद घर लौटते समय कोयले घर लाने की प्रथा है, जो समृद्धि लाती है। शहरी क्षेत्रों में 'लोहड़ी व्याहना' जैसी शरारतें भी होती हैं।
यह पर्व सामुदायिक एकता को मजबूत करता है, जहां जाति-धर्म भूलकर लोग इकट्ठे होते हैं। सर्द रात्रि में अलाव की गर्माहट सर्दी के अंत और लंबे दिनों की शुरुआत का संकेत देती है।पंजाबी संस्कृति में भांगड़ा और गिद्धा इसके अभिन्न अंग हैं, जो युवा ऊर्जा को प्रदर्शित करते हैं। लोहड़ी पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है, क्योंकि फसल अवशेष जलाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है। आधुनिक समय में भी यह परंपराओं को जीवित रखता है।
भारत कृषि प्रधान देश है और पंजाब फसल उत्पादन का केंद्र। लोहड़ी रबी फसल की सफलता का उत्सव है, जो बुवाई से कटाई तक की मेहनत का सम्मान करता है। सूर्य की उत्तरायण गति से सूर्योदय लंबा होने लगता है, जो किसानों के लिए शुभ है। यह त्योहार प्रकृति चक्र से मानव जीवन के जुड़ाव को रेखांकित करता है।लोहड़ी केवल एक रात्रि का पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है जो पीढ़ियों को जोड़ती है। यह खुशहाली, एकता और आभार का संदेश देता है।
🙏🌹 सादर वन्दे 🌹🙏
डॉ नीतेश सिंह

.jpeg)
.jpeg)
.jpeg)




टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें