सज्जनो का दुष्टों से धर्मयुद्ध


जीवन की यथार्थवादी चुनौतियाँ

जीवन एक युद्धभूमि है, जहाँ सज्जन पुरुष को भी दुष्टों के कुटिल आघातों का सामना करना पड़ता है। यह कथन केवल एक कहावत नहीं, बल्कि अनुभव की गहराई से निकला सत्य है। प्राचीन काल से ही भारतीय दर्शन हमें सिखाता है कि सत्य, धर्म और सदाचार का मार्ग कभी सरल नहीं होता। दुष्टता के बादल सज्जनता के सूर्य को ढकने का प्रयास करते हैं, किंतु अंततः सत्य की ज्योति प्रज्वलित होती ही है। भगवद्गीता इस सत्य का सर्वोत्तम प्रतिपादक ग्रंथ है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि में दुष्टों से लड़ने की प्रेरणा देते हैं। इस लेख में हम एक काल्पनिक किंतु गीता-प्रेरित कहानी के माध्यम से इस विषय की गहराई समझेंगे। कहानी के नायक एक सज्जन गृहस्थ हैं, जो दुष्टों के जाल में फँसते हैं, किंतु गीता के श्लोकों से प्रेरित होकर विजयी होते हैं। 


सज्जन की साधारण जीवनयात्रा

एक छोटे से गाँव में रामदास नामक एक सज्जन पुरुष रहते थे। वे एक किसान थे, जो कड़ी मेहनत से अपनी फसलें उगाते और गाँव वालों को निस्वार्थ भाव से सहायता करते। रामदास का जीवन गीता के कर्मयोग पर आधारित था। वे प्रातःकाल उठकर गीता पाठ करते और "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" (गीता 2.47) श्लोक को जीवन का मूलमंत्र मानते। अर्थात्, कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। रामदास फल की इच्छा किए बिना सेवा करते—गरीबों को अनाज बाँटते, विवादों में मध्यस्थता करते। गाँववासी उन्हें 'सज्जन राम' कहकर पुकारते।किंतु सज्जनता का यह प्रकाश दुष्टों की आँखों में खटकने लगा। गाँव के एक धनी जमींदार हरि शर्मा, जो लोभी और कपटी था, रामदास की जमीन पर नजर गड़ाए हुए था। हरि शर्मा दुष्टों का सरदार था—वह रिश्वत देकर सरकारी अधिकारियों को अपने पक्ष में करता, गरीबों को उजाड़ता। एक दिन, हरि ने अपने गुंडों को रामदास के खेतो में भेजा और रामदास की फसल को नष्ट करवा दिया। रामदास स्तब्ध रह गए। उनके मन में प्रश्न उठा—क्यों सज्जन को दुष्टों का सामना करना पड़ता है? यहाँ गीता का श्लोक स्मरण हो आया: "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥" (गीता 2.3)। अर्थात्, हे पार्थ! क्लैब्य (कायरता) मत कर, यह तेरे लिए शोभा नहीं देता। हृदय का क्षुद्र दुर्बलता त्यागकर उठ जा हे अरि-नाशक!रामदास ने हार न मानी। उन्होंने गीता का यह श्लोक जपते हुए थाने पहुँचने का निश्चय किया।

दुष्टों का जाल: संघर्ष की शुरुआत

हरि शर्मा ने रामदास के विरुद्ध षड्यंत्र रचा। उसने झूठे साक्षी खड़े किए कि रामदास ने ही अपनी फसल जला दी। थाने में पुलिस अधिकारी, जो हरि का भ्रष्ट साथी था, रामदास को गिरफ्तार करने पहुँचे। गाँववासी आश्चर्यचकित थे—सज्जन राम पर कैसे अपराध लगा? रामदास को जेल हुई। जेल की कोठरी में अँधेरी रात्रि व्यतीत करते हुए वे गीता पाठ करने लगे। वहाँ एक वृद्ध कैदी मिला, जो स्वयं गीता का ज्ञाता था। उसने कहा, "बेटा, दुष्टों का सामना तो सज्जनों का धर्म है। गीता कहती है—'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥' (गीता 4.7)। अर्थात्, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेता हूँ। तू भी धर्मरक्षक बन।"रामदास प्रेरित हुए। जेल से बाहर आने पर उन्होंने अदालत का रुख किया। हरि शर्मा ने वकीलों को खरीद लिया, झूठे दस्तावेज पेश किए। अदालत में रामदास अकेले खड़े थे। जज ने पूछा, "तुम्हारे पक्ष में कोई साक्ष्य?" रामदास ने गीता का सहारा लिया: "सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते। क्रोधात्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः॥" (गीता 2.62)। अर्थात्, संगति से कामना जन्म लेती है, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह और मोह से स्मृति भ्रम। हरि की दुष्ट संगति ही इसका कारण है। रामदास ने गाँववालों से सत्य साक्ष्य माँगे। कुछ सज्जन गवाह बने, किंतु अधिकांश भयभीत थे।

गीता का प्रकाश: आंतरिक संघर्ष

कहानी का मध्य भाग रामदास के आंतरिक संघर्ष पर केंद्रित है। एक रात्रि, वे नदी किनारे बैठे गीता पढ़ रहे थे। मन में उदासी छाई थी—क्यों दुष्ट सफल होते हैं? तभी उन्हें स्मरण आया कुरुक्षेत्र का युद्ध। अर्जुन भी सज्जन थे, किंतु दुर्योधन जैसे दुष्टों से लड़ना पड़ा। श्रीकृष्ण ने कहा, "इष्टान्भोगेषु कोन्तेय न तेषु रमते मनः। आस्वादं हि न जानन्ति तेषु स्वादं निधनं तथा॥" (गीता 5.22, संदर्भित)। वास्तव में गीता 2.70: "आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥" अर्थात्, जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं किंतु समुद्र अचल रहता है, वैसे ही कामनाएँ आने पर भी जिसका मन अचल है, वही शान्ति पाता। रामदास ने दुष्टों के प्रलोभनों को त्याग दिया।हरि ने रामदास को प्रलोभित किया—जमीन छोड़ दो, लाखों रुपये लो। रामदास ने अस्वीकार किया। हरि ने हिंसा की धमकी दी। रामदास ने गीता का श्लोक याद किया: "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥" (गीता 2.23)। आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती। रामदास का आत्मविश्वास बढ़ा। उन्होंने गाँव में सत्याग्रह आरंभ किया। महिलाएँ, बच्चे उनके साथ आए। धीरे-धीरे सत्य का प्रकाश फैला।

चरमोत्कर्ष: धर्मयुद्ध का निर्णय

अदालत का दिन आया। हरि के वकील चीखे, "यह सज्जनता का ढोंग है!" रामदास ने शांत स्वर में गीता उद्धृत की: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥" (गीता 18.66)। अर्थात्, सभी धर्मों का त्याग कर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त करूँगा। जज प्रभावित हुए। गवाहों ने सत्य बोल दिया। हरि के गुर्गे टूट पड़े। अदालत ने रामदास को निर्दोष घोषित किया। हरि को सजा मिली।

समापन: गीता का संदेश और सीख

रामदास की विजय सिद्ध करती है कि सज्जन को दुष्टों का सामना अवश्य करना पड़ता है, किंतु गीता मार्गदर्शन देती है। जीवन में दुर्योधन जैसे हरि शर्मा आएँगे, किंतु अर्जुन की भाँति कर्मयोगी बनो। गीता सिखाती है—निष्काम कर्म करो, आत्मा पर विश्वास रखो। आज के समाज में भ्रष्टाचार, अन्याय व्याप्त है। सज्जन डॉक्टर, शिक्षक, किसान—सभी को दुष्ट सिस्टम का सामना करना पड़ता है। किंतु "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥" (गीता 2.48) से संतुलन बनाए रखें। रामदास आज गाँव के सरपंच हैं, गीता पाठ आयोजित करते। उनकी कहानी प्रेरणा है—दुष्ट आते हैं, किंतु सज्जन की ज्योति अखंड रहती है।यह संघर्ष हमें याद दिलाता है कि सत्य की विजय निश्चित है। गीता का सार यही है—संघर्ष करो, किंतु आसक्ति त्यागो। सज्जनता का मार्ग काँटों भरा है, किंतु फूलों से भरा स्वर्गीय अनुभव देता है।

      

                           🙏सादर वन्दे 🙏

                            डॉ. नीतेश सिंह





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