मकर संक्रांति का महान पर्व उल्हास व उत्साह से जुड़ा है।ईश्वर की कृपा से नई फसल का आरम्भ होना, प्राप्त नये अन्न से यज्ञ, दान-पुण्य आदि कर्मोँ को करते ईश्वर का प्रति सकेण्ड धन्यवाद करना चाहिए।
सूर्य भगवान् की किरणें, तेज व प्रकाश प्राणी मात्र के लिए जीवन दायक है, मकरसंक्रांति से सूर्य भगवान् का क्रमशः दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ना अर्थात् दिन (प्रकाश) का बड़ा होना व रात्रि (अन्धकार) का छोटा होना जो ज्ञानी विद्वज्जन पुरुष हैं उनके लिए उत्साह व आनन्द का पर्व !
“उत्तरायणं पुण्यकालः” उत्तरायण का अर्थ केवल सूर्य का उत्तर दिशा में जाना नहीं,बल्कि जीवन को श्रेष्ठ दिशा में ले जाना है।
बाकी व्यक्तियों के लिए पतंगोत्सव का हर्षोल्लास पर्व ।
प्रत्येक के जीवन से अज्ञान व अंधेरा छंट जाए और ज्ञान व प्रकाश से जीवन मंगलमय हो।
मकर संक्रांति ज्योत्सिया गणना के अनुसार जब सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं तो मकर संक्रांति कहलाती है। और इसी समय बृहस्पति महाराज का दृष्टि संबंध है स्थान संबंध हो तो कुंभ लगता है। सूर्य बृहस्पति और शनि के संबंध से पृथ्वी पर मंगल कार्य प्रारंभ होते हैं। फसले पक जाती हैं।

इसी दिन भागीरथी महाराज ने माता गंगा को अपने 60000 पितरों को तारने के लिए गंगासागर पहुंचे थे। आज के दिन गंगासागर स्नान का बहुत ही बड़ा महत्व है। शीत ऋतु का प्रकोप आज के दिन से कम होना प्रारंभ हो जाता है। शीत जनित बीमारियां कम होने लगती हैं। इस दिन घी खिचड़ी खाने का प्रावधान है इससे हमारे फेफड़ों नसों में फंसी हुई बलगम धीरे-धीरे बाहर आ जाता है। कहीं-कहीं तिल और गुड़ का भी सेवन किया जाता है वह भी उष्ण पदार्थ होता है जो हमारे शरीर में शीत ऋतु में कफ अधिक होता है उसे बाहर कर देता है। आज के दिन चावल और साबुत उड़द दान देने का भी प्रचलन है। इससे पितरों की मुक्ति होती है। लोग आज के दिन कंबल तिल गुड चावल आदि दान देते हैं। यह शनि बृहस्पति सूर्य चंद्रमा आदि जो आज के दिन गोचर कर रहे हैं उनके लिए यह दान किया जाता है जो सीधा पितरों के मोक्ष प्रदान करता है।
मकर संक्रांति धरती नहीं बल्कि ब्रह्मांड की घटना है एक नाराज पुत्र के पास तेजस्वी पिता जाता है। इसके प्रभाव से पृथ्वी पर मंगल कार्य बढ़ने लगते हैं। महाराष्ट्र में इसे मकर संक्रांति कहते हैं।
बिहार और उत्तर प्रदेश में से खिचड़ी कहते हैं। हरियाणा पंजाब जम्मू कश्मीर में इसे लोहड़ी कहा जाता है, इस लोहड़ी कार्यक्रम में रहने का मुझे सौभाग्य भी मिला है। असम में इसे बिहू कहा जाता है। आज के दिन लोग पतंग उड़ाते हैं।
गंगा स्नान करते हैं । दान और पुण्य करते हैं। आज के ही दिन से एक मास का कल्पवास प्रयागराज में प्रारंभ हो जाता है। कहां जाता है कल्पवास के दौरान भारत के ऋषि तपस्वी के साथ देवता भी संगम तट पर आकर के तपस्या में लीन हो जाते हैं।
मकर संक्रांति का बहुत बड़ा महत्व है, अपने पुण्य भूमि भारत में। सस्कृति और सामाजिक परिवर्तन का पर्व मकर संक्रांति है। मकर संक्रांति की विचारधारा भी यही सिखाती है।अंधकार नहीं, प्रकाश की ओर।स्वार्थ नहीं, सेवा की ओर। मैं नहीं, हम की ओर। सेवा कार्य करने वाला नागरिक। इसी उत्तरायण पथ की साक्षात प्रतीक मकर संक्रांति केवल पर्व नहीं,संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन का पर्व है ।आइए— सूर्य की तरह प्रकाश बनें तिल-गुड़ की तरह मधुर बनें और पतंग की तरह ऊँचाइयों को छुएँ और भारत माता की जय पुरे विश्व मे गूंजे ऐसी सूर्य देव से प्रार्थना करें।
🙏🌹 सादर वन्दे 🌹🙏
डॉ नीतेश सिंह
बहुत सुंदर
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